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परिवार में रिश्तो की गरिमा बनीं रहे

रिश्ता कितना भी प्रिय क्यूँ ना हो, निजी कार्यों में दखल देना रिश्ते की मर्यादा भंग करना है कई बार आपसी रिश्ते जरा सी अनबन और झुठे अंहकार की वजह से क्रोध की अग्नी में स्वाह हो जाते हैं। रिश्तों को दूषित करने के लिए कोई ख़ास समाज या सरकार या समूह दोषी नहीं है, बल्कि समस्त मानवता जिम्मेवार है| आज व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ चुकी है कि लोग रिश्तों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर ऊपर चढ़ जाना चाहते हैं, और जैसे ही सफलता मिली तो फिर उन्हीं रिश्तों को रौंद डालते हैं| रिश्ते बुरे समय में सर्वाधिक सहायक होते हैं परन्तु नित्य रिश्तों से सहायता की आशा रखना भी रिश्तों की मर्यादा भंग करना है क्योंकि रिश्ते सहायक अवश्य हैं लेकिन उन्हें व्यापार बनाने से उनका अंत निश्चित होता है । मोह, लोभ, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्षा, घृणा, कुंठा, निराशा, आक्रोश, प्रेम, श्रद्धा, शक, विश्वास, ईमानदारी, परोपकार, दान, भीख, चंदा, स्वार्थ, चापलूसी, आलोचना, बहस, तर्क, कोई भी विषय हो जब तक मर्यादा में रहता है कभी हानिप्रद नहीं होता परन्तु मर्यादा भंग होते ही समस्या अथवा मुसीबत बन जाता है । अग्नि, जल एवं वायु संसार को जीवन प्रदान करते हैं परन्तु अपनी मर्यादा लांघते ही प्रलयंकारी बन जाते हैं जिसका परिणाम सिर्फ तबाही होता है. आदर शब्द में एक गुढ़ अर्थ निहित है, रिश्तों को उसके गुण दोषौं के साथ अपनाने का। गुणों को प्रशंसा की दृष्टि से देखना और दोषों को दूर करने का प्रयास ही आदर है। आदर देने पर आदर ही प्राप्त होता है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि …जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है, पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है। जब सभी व्यक्ति अपने परिवार में संस्कारों और रिश्तों के सम्मान की भावना को साथ लेकर चलेंगे तो कोई भी व्यक्ति गलत काम करने से पहले सौ बार साचेगा। परिवार में रिश्तो की गरिमा बनीं रहे इसके लिए अभिभावकों और बच्चों को ही इसको गहराई से समझना होगा । सच्चाई चाहे जो भी हो ये सत्य है कि रिश्तों को सहेजने और सँवारने की जरुरत होती है, और बहुत कम लोग ही रिश्तों की कसौटी पर खरे उतर पाते है. सौरभ दोहरे इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

07/05/2021
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